असंगठित क्षेत्रों पर संकट: अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी तेजी से घटी
नई दिल्ली
देश के असंगठित क्षेत्रों पर संकट गहराता जा रहा है। बीते तीन साल में भारतीय अर्थव्यवस्था में असंगठित क्षेत्रों का योगदान 52 फीसदी से घटकर करीब 15-20 फीसदी रह गया है। यह बड़ा बदलाव वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी), डिजिटलीकरण और नोटबंदी करने के बाद देखने को मिला है। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के आर्थिक अनुसंधान विभाग की रिपोर्ट ‘इकोरैप’ से यह जानकारी मिली है।
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि चालू वित्त वर्ष में संगठित क्षेत्रों मुकाबले असंगठित क्षेत्रों का योगदान 15 से 20 फीसदी रह गया है। हाल के वर्षो में संगठित क्षेत्र से भारतीय अर्थव्यवस्था में करीब 13 लाख करोड़ रुपये आए हैं। रिपोर्ट से पता चलता है कि कृषि क्षेत्र काजीवीए 2017-18 में 97.1% से घटकर 2020-21 में केवल 70% -75% रह गया है।
इसी तरह रियल एस्टेट का जीवीए 2017-18 में 52.8% से घटकर पिछले साल 20%-25% तक रह गया। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि कोविड महामारी के बाद से लगभग ₹1.2 लाख करोड़ नकद उपयोग किया गया है। 2017-18 से 2020-21 के बीच कृषि ऋण प्रवाह में ₹4.6 लाख करोड़ की वृद्धि हुई है। वहीं, इसी अवधि में पेट्रोल और डीजल के लिए डिजिटल भुगतान में लगभग ₹1 लाख करोड़ की वृद्धि हुई है।
एसबीआई की रिपोर्ट में सरकार से ईंधन पर लगने वाले करों की समीक्षा करने की सलाह दी गई है। इसकी वजह यह बताई गई है कि देश के 57.2 करोड़ लोग अभी भी असंगठित अर्थव्यवस्था से जुड़े हुए हैं। अगर हम एक परिवार में पांच लोग मानते हैं तो कर देने वालों की तदाद करीब 11.4 करोड़ बैठती है, जो देश में कर देने वालों के बराबर हैं। गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की खपत के लिए समायोजन करते हुए, ये 11.4 करोड़ कर भुगतान करने वाले परिवार आबादी का 8.5% निजी अंतिम उपभोग व्यय का 65% योगदान करते हैं। ऐसे में अगर सरकार ईंधन पर लगने वाले करों की समीक्षा करती है तो इस बड़ी आबादी को लाभ मिलेगा।

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